Wednesday, January 9, 2013

थका हुआ दिन


थका हुआ दिन कंधेसे उतार फेका
जैसे शरिरसे लिबास उतार फेका हो
तनहाई को लिपटे फिर बिस्तर पे ऐसे फैल गये
की अब परछाईसेभी तौबा कर ली हो
दिनभर झगड़े थे ... किससे??.. मालूम नही
पर जैसे हारकर लौटे थे

कुछ ज़्यादाही उम्मीद थी खुदसे शायद
इसलिये मायूससे लौटे थे
वक़्त ऐसे गुजर रहा था ..
जैसे साँसे छूटनेसे कोई शक़स गुजर जाता है ..

पलकें बंद कर फि
रगुमसुम से अंधेरेमें गुम हुए  
चाँद से सूरजतक का सफ़र
साँसोने बिनाशोर पी लिया

सुबह जब आँख खुली
तो खिडकीका खुला पर्दा
आँखोसे पर्दा उठाने लगा
उँगुलियोंसे जब पलकोंको जुदा किया
तो दीवार पे टन्गी घड़ी घूर रही थी

घड़ीके काटें जैसे काटने को दौड़े
हडबहाट, बेचैनी फिरसे नोचने लगी
हर बीतती हुई घड़ी आनेवाले समय का नक़ाब पहन डराने लगी

आँखे सॉफ कर जब खुदसे बाहर निकलके देखा
तो खिड़कीतले वही चिड़िया फिरसे घोसला बना रही थी
माथेपे शिकंज लिए भागते लोगोंकी भीड़ आज भी उमड़ पड़ी थी
सुखभी कामिनी चीज़ है ..थोडासा पानेके लिए हर रोज़ बड़ा दुख देती है
लग रहा था सब आईने पहने निकले है
हर किसीमे मेरा थोड़ा अक्स था ..

लंबी साँस लेके जब.. 
ज़रासा माज़ी में जब झाँक कर देखा 
तो कुछ ख्वाब मायूस नज़रसे देख रहे थे
कुछ वादे किए थे मैने उनसे..
जो अबभी निभाने बाकी है
हर रोज़ की तरह मैंने वादा किया 
की कलसे उन्हे निभाउन्गा  


और कल उतारा हुआ दिन मैने फिरसे पह्न लिया