Thursday, October 16, 2014

वजूद

खाली बस्ती .. आग जले है
धुआँ धतूरा ... हाथ मले है
आँखमें कोई दाग है शायद
बिना बात आसू छलके है
पिद्दीसी मूरत है
जिद्दिसी सिरत है
खुशबूके चोचलोमें फसी
काँटोंकी नियत है
मनमें चाहे लाख गिले है
लगते तो सबकेही गले है
आजके दाढ़ीमें है तिनका
लागे चोर कलके निकले है

आजा री निन्दिया ...


आजा री निन्दिया
सपनोंकी बतिया
करे रातभर
पलकोंमें ठहर
बस चाँदभर .. आ री
आजा री निन्दिया ...

चाँदनीके चोंचले है
आँखोको परोसने है
रातके कुएमें ढुन्डो
फुरसतोंकी धड़कने हो
क़ैद कोई करके लाओ
मनकी थोडिसी रिहाई
मिट जाए पलकोंतले
चल रही खामोश लड़ाई

घड़ीके काँटोंकी
सुनते कहानिया
आजा री निंदियाँ


करवटोंके झूलेमे
झूलते नमकिनोंमे
दिनमें गिरवी रखे
रातोंके सुकूनोंमे
सारेही सुहाने है
सपने जो सजाए है
ख्वाहिशोंकी बस्तीसे से
चुनके जो चुराए है

चुपकेसे घुस जा री
पलकोंकी आँगनियाँ
आजा री निंदियाँ