जहाँ लहरेंभी थक जाए बहते बहते
और आसमाँ भी रुक जाए चलते चलते
उफक़कि रेखापर समयभी झुक जाये
और थम जाये सूरजभी ढलते ढलते
जहा यादें भी मन तक पहुँच ना पाएँ
और आसूभी आँखोसे ओंझल हो जाये
जिस किनारे का कोई किनारा ना हो
और खयालॉँका कोई बहाना ना हो
जहा बस एक दीवार हो हवासे भी पतली
और सन्नाटेसे भी धीमी आवाज़की गली
जहासे गुज़रु तो मैं भी देख पाउ
की उस जानिब कौन टेक लगाए बैठा है
मैं खुद से मिल जाउ जहाँ
ए माझी मुझे ले चल तू वहाँ ......
Lines inspired by Gulzar's poem