Monday, June 10, 2013

खामोश नही है मन मगर ....



खामोश नही है मन मगर
ज़ुबाँ सिली है
रूखी इन मुस्कुराह्टोमें
सिसकियाँ घुली है

असिरसी ये जिंदगी
साँसोंकी सलाखोंमें
कौनसा गुनाह जिसकी
ये सज़ा मिली है

क़ाबिल-ए-तारीफ़
आँखोंकी अदाकारी है
धुआँ भी ना उठा
अंदरसे जब ये जली है

माज़ीके खीरछें
पैरोंमें चुभते है
लगता है ख्वाबोंने
लड़नेकी ठान ली है