कधी कधी मनही माझ्याशी बोलेनास होत
त्यालाही एकट रहावास वाटत
रुसलय का चिडलय कळतच नाही
कदाचित त्यालाही मित्रान्शिवाय करमत नसत
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तेरी झुल्फोंकी लटे आँखोंपर जो बिखरी
तो ऐसा लगा जैसे रात हो गयी
और दिलसे आवाज़ निकली....आज सितारें ज़्यादा क्यूँ है ??
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कई मोड़ लेके रास्ते फिरसे मिल रहे थे
कई शब गुज़ारे थे चौराहेपे राह देखके
बस मिले तो पहचान नही पाए एक-दूसरेको
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झिलमिलातेसे कुछ ख्वाब चमक रहे थे आसमानमें
चाँद समझके बसा लिया तुझे इन आँखोंमें
तभी सोचूँ जिंदगीमें इतना अंधेरा क्यूँ है ?
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जहाँ लहरें भी थक जाये बहते बहते...
और आसमाँ भी रुक जाये चलते चलते...
उफक़कि रेखापर समयभी रुक जाये...
और सूरजभी थम जाये ढलते ढलते....
ए माझी ..चल ले चल मुझे
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सावनकी सांझी बूँदें
पत्तोंसे लिपटे कहे
आदाब नमस्ते करने
बादलसे आई हूँ में
तू बाहोंमें अपनी लेके
मुझकोभी हरा बना दे
ए चाँद, सितारों, हवाओं
ज़रा अपना रुख़ मुड़ा दे
सच्चे झूठेसेभी उँचे
इश्क़ को सलाम
सलाम-ए-इश्क़
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कशी पुरतील सये
सात जन्मे प्रेमासाठी
एका दिसापरी सारी
संपतील ना .....
युगे युगे माझ्यासाठीच
पुन्हा पुन्हा धरेवरी
पाठवाया साकड तू
घालशील ना ....
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