खामोश नही है मन मगर
ज़ुबाँ सिली है
रूखी इन मुस्कुराह्टोमें
सिसकियाँ घुली है
असिरसी ये जिंदगी
साँसोंकी सलाखोंमें
कौनसा गुनाह जिसकी
ये सज़ा मिली है
क़ाबिल-ए-तारीफ़
आँखोंकी अदाकारी है
धुआँ भी ना उठा
अंदरसे जब ये जली है
माज़ीके खीरछें
पैरोंमें चुभते है
लगता है ख्वाबोंने
लड़नेकी ठान ली है
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