Wednesday, September 29, 2010

कविता



कधी कधी मनही माझ्याशी बोलेनास होत
त्यालाही एकट रहावास वाटत
रुसलय का चिडलय कळतच नाही
कदाचित त्यालाही मित्रान्शिवाय करमत नसत
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तेरी झुल्फोंकी लटे आँखोंपर जो बिखरी
तो ऐसा लगा जैसे रात हो गयी

और दिलसे आवाज़ निकली....आज सितारें ज़्यादा क्यूँ है ??

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कई मोड़ लेके रास्ते फिरसे मिल रहे थे
कई शब गुज़ारे थे चौराहेपे राह देखके

बस मिले तो पहचान नही पाए एक-दूसरेको

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झिलमिलातेसे कुछ ख्वाब चमक रहे थे आसमानमें
चाँद समझके बसा लिया तुझे इन आँखोंमें
तभी सोचूँ जिंदगीमें इतना अंधेरा क्यूँ है ?

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जहाँ लहरें भी थक जाये बहते बहते...
और आसमाँ भी रुक जाये चलते चलते...
उफक़कि रेखापर समयभी रुक जाये...
और सूरजभी थम जाये ढलते ढलते....

ए माझी ..चल ले चल मुझे

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सावनकी सांझी बूँदें
पत्तोंसे लिपटे कहे
आदाब नमस्ते करने
बादलसे आई हूँ में

तू बाहोंमें अपनी लेके
मुझकोभी हरा बना दे
ए चाँद, सितारों, हवाओं
ज़रा अपना रुख़ मुड़ा दे

सच्चे झूठेसेभी उँचे
इश्क़ को सलाम
सलाम-ए-इश्क़

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कशी पुरतील सये
सात जन्मे प्रेमासाठी
एका दिसापरी सारी
संपतील ना .....

युगे युगे माझ्यासाठीच
पुन्हा पुन्हा धरेवरी
पाठवाया साकड तू
घालशील ना ....

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