Saturday, September 4, 2010

चाँदकी कहानी

रातकी सतह्पर चाँद अपना रास्ता बना रहा था
बादलोँकि धूल उछालें, सितारोन्कों निहारे, बस बढ़ाताही जा रहा था
रातके अंधेरेमेंभी उसको किनारा साफ़ साफ़ नज़र आ रहा था
उसी किनारेसे सुबहकी नदी बहती थी
किनारेपे तो वो ठंडी, सुनहरी थी
पर बिच-मजधार वो उग्र हो जाती थी
बिना सोचे समझे चाँदने उसमें डुबकी लगाई
देखतेही देखते वो नदीमें जैसे घुलसा गया
अब चाँदको ढुंडना मुश्किल हो गया था
सूरजकी किरनोंसे खुदको ढके वो नदी पार कर रहा था
तैरते तैरते वो वो किनारे पहुँच गया
किनारेपे एक और रात उसका इंतज़ार कर रही थी
और उसके किनारे शायद और एक सुबह

जिंदगीभीतो चाँदसी सफ़र करती है
कभी अंधेरें तो कभी उजालोंमें रहगुजर करती है
काश उसकोभी चाँदकी तरह सफरका गिला ना होता

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