ए ज़िन्दगी बंजारन
चली कौन गाँव आज तू
पाँवके छालेभी छिल गए
अब भी रास्ते नाराज़ क्यूँ ?
नैनोसे गुजरा था कोई
पुराने गाँव का बादल था
पलके मूँद पी लिया है
गिली यादोंका घूँट यूँ
टहलते सपनोंके पाखी
उड़ती नजरोंसे मिले थे
क्या पता कब हो मुकम्मल
जो चल रही है जुस्तजू
फिरसे वह आवाज़ तेरी
रूह से टकराने दे
ग़ज़लसी सांसोपे चढ़ा दे
मन का सूफी साज़ तू
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